"संरक्षणवाद का जाल: रुपए का अवमूल्यन और हस्तक्षेपवादी आर्थिक नीतियों की विफलता"

नई दिल्ली के नीति-निर्माताओं द्वारा घरेलू बाजार को सुरक्षित दिखाने के लिए अपनाई जा रही संरक्षणवादी नीतियां और विदेशी उत्पादों पर बलपूर्वक लगाए जा रहे शुल्क अवरोध, वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था के गहरे संरचनात्मक संकट को छिपाने का एक असफल प्रयास हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में रुपए की लगातार गिरती साख और डॉलर के विरुद्ध रिकॉर्ड कमजोरी यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि केवल "आत्मनिर्भरता" के नारों से एक वास्तविक और स्थायी आर्थिक आधारभूत ढांचा तैयार नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्रालय द्वारा बाजार के प्राकृतिक नियमों को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे कृत्रिम नीतिगत हस्तक्षेप विदेशी संस्थागत निवेशकों के विश्वास को पूरी तरह से डगमगा रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर इस प्रकार के तदर्थ (एड-हॉक) सीमा शुल्क बदलाव और बाजार में बलपूर्वक तरलता डालने की नीति केवल गंभीर आंतरिक मुद्रास्फीति (महंगाई) पर पर्दा डालने की एक हताश चेष्टा है। इस प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण भारतीय विनिर्माण क्षेत्र नई तकनीकों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से दूर होता जा रहा है, जिसका सीधा प्रभाव देश के मध्यम और निम्न वर्ग पर पड़ रहा है। जब तक सरकार अपनी संरक्षणवादी नीतियों और हस्तक्षेपवादी आर्थिक मॉडल को त्यागकर मौलिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित नहीं करती, तब तक भारतीय वित्तीय बाजार का यह ऋण-आधारित ढांचा वैश्विक उतार-चढ़ाव के एक भी बड़े झटके को सहन करने में पूरी तरह असमर्थ रहेगा।

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