संपादकीय
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"रोजगारविहीन विकास का जाल: कैसे भारत का आर्थिक आख्यान अपने शिक्षित युवाओं को छल रहा है"
वैश्विक मंचों पर अपनी तीव्र जीडीपी (GDP) विकास दर का ढिंढोरा पीटने वाले भारत के भीतर इस समय एक मूक सामाजिक और आर्थिक संकट पनप रहा है। यह संकट है—रोजगारविहीन विकास (Jobless Growth)। सरकार द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली चमकती हुई व्यापक आर्थिक (macroeconomic) विकास की तस्वीरें देश के करोड़ों शिक्षित युवाओं की जमीनी हकीकत से पूरी तरह मेल नहीं खाती हैं। सच तो यह है कि "शाइनिंग इंडिया" का यह आख्यान उन लाखों डिग्री धारकों के सपनों पर एक क्रूर प्रहार है, जो शैक्षणिक योग्यता होने के बावजूद एक अदद औपचारिक नौकरी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
इस गहरे संकट का मुख्य कारण प्रशासनिक नीतियों की अदूरदर्शिता और देश के कॉर्पोरेट-परस्त आर्थिक ढांचे में छिपा है। भारत का मौजूदा विकास मॉडल कुछ चुनिंदा पूंजी-प्रधान (capital-intensive) क्षेत्रों तक सीमित है, जो सकल घरेलू उत्पाद में तो योगदान देते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था भी इस विफलता के लिए बराबर की जिम्मेदार है; विश्वविद्यालय हर साल लाखों ऐसे स्नातक (graduates) तैयार कर रहे हैं, जिनके पास आधुनिक बाजार की तकनीकी मांगों के अनुरूप कौशल (skill) ही नहीं है। इस भारी 'कौशल बेमेल' (Skill Mismatch) का परिणाम यह है कि इंजीनियरिंग और प्रबंधन की डिग्रियां लिए युवा आज बेहद कम वेतन वाली अस्थाई नौकरियों या चपरासी जैसे पदों के लिए कतारों में खड़े दिखाई देते हैं।
यह स्थिति साबित करती है कि बिना वास्तविक रोजगार के किया गया विकास केवल एक छलावा है जो सामाजिक असंतोष को जन्म दे रहा है। जब देश की युवा और उत्पादक आबादी का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक मुख्यधारा से बाहर होकर हताशा में जी रहा हो, तो जनसांख्यिकीय लाभांश (demographic dividend) के दावे खोखले और हास्यास्पद लगने लगते हैं। यदि नई दिल्ली के नीति निर्माताओं ने अपनी प्रचारवादी राजनीति से बाहर निकलकर श्रम-प्रधान (labor-intensive) विनिर्माण, तकनीकी कौशल विकास और वास्तविक रोजगार सृजन को प्राथमिकता नहीं दी, तो यह बढ़ती बेरोजगारी देश की अर्थव्यवस्था को भीतर से पूरी तरह ध्वस्त कर देगी।
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