मानसून की चेतावनी: केवल मौसम नहीं, शासन की भी परीक्षा

संपादकीय मंडल | Voice of Spain – हिन्दी संस्करण

भारत में मानसून केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। ऐसे समय में जब भारतीय मौसम विभाग ने जुलाई में सामान्य से कम वर्षा की आशंका व्यक्त की है और जून का महीना पिछले एक शताब्दी से अधिक समय में सबसे शुष्क जूनों में दर्ज हुआ है, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की कृषि व्यवस्था ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है।

कृषि केवल किसानों का विषय नहीं है। भारत की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि खाद्य मूल्य, महँगाई, ग्रामीण रोजगार और औद्योगिक उत्पादन भी वर्षा के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होते हैं। कमजोर मानसून का प्रभाव खेतों तक सीमित नहीं रहता; इसका असर पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई देता है।

सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि, सिंचाई योजनाओं तथा कृषि निवेश जैसे अनेक कदम उठाए हैं। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या ये उपाय जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नई चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त हैं। वर्षा पर अत्यधिक निर्भर कृषि, सीमित सिंचाई, जल संरक्षण की कमी और छोटे किसानों की आर्थिक असुरक्षा आज भी भारत की कृषि व्यवस्था की प्रमुख कमजोरियाँ हैं।

नीतियों की सफलता केवल उनकी घोषणा से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से कि उनका लाभ समय पर खेत तक पहुँचता है या नहीं। यदि किसान समय पर बीज, सिंचाई, उर्वरक, ऋण और बाज़ार तक पहुँच से वंचित रह जाएँ, तो नीति और वास्तविकता के बीच की दूरी बढ़ जाती है। यही वह क्षेत्र है जहाँ शासन की प्रभावशीलता की वास्तविक परीक्षा होती है।

जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चुनौती नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। इसलिए कृषि नीति को केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। जल प्रबंधन, सूखा-रोधी फसलें, वैज्ञानिक अनुसंधान, कृषि बीमा और ग्रामीण अवसंरचना को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना आवश्यक है। यदि इन क्षेत्रों में निवेश पर्याप्त नहीं होगा, तो हर कमजोर मानसून एक राष्ट्रीय आर्थिक संकट का रूप ले सकता है।

VoS संपादकीय दृष्टिकोण

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना उसका विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि उसे अधिक उत्तरदायी बनाने के लिए की जाती है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से होना चाहिए। भारत जैसे विशाल कृषि प्रधान देश में किसान की सुरक्षा केवल एक आर्थिक प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक न्याय का प्रश्न है। मानसून पर निर्भरता कम करना और कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप बनाना आने वाले वर्षों में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

संपादकीय टिप्पणी

इस संपादकीय में व्यक्त विचार Voice of Spain – हिन्दी संस्करण के संपादकीय मंडल के हैं। इसका उद्देश्य सार्वजनिक नीति और शासन से जुड़े मुद्दों पर विचारोत्तेजक विमर्श को बढ़ावा देना है। इसे समाचार रिपोर्ट के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

 

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