भारतीय संविधान की आत्मा इसके संघीय ढांचे (Federal Structure) में रची-बसी है, जहां केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे की पूरक बनकर देश के विकास को गति देने का काम करती हैं। संविधान निर्माताओं का स्पष्ट मानना था कि एक विविधतापूर्ण और विशाल देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्यों का आर्थिक और प्रशासनिक रूप से मजबूत होना अनिवार्य है। लेकिन हाल के वर्षों में राजस्व आवंटन, जीएसटी (GST) क्षतिपूर्ति और केंद्रीय योजनाओं की फंडिंग को लेकर जिस तरह के हालात बने हैं, वे भारतीय संघवाद की नींव पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
आज राज्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy) पर गहराता नियंत्रण है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद राज्यों के पास अपने स्तर पर कर लगाने और राजस्व जुटाने के अधिकार बेहद सीमित हो गए हैं। करों के विकेंद्रीकरण (Tax Devolution) में देरी और राज्यों के हिस्से का पैसा केंद्र के पास अटके रहना केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक और आर्थिक दबाव का हिस्सा प्रतीत होता है।
इसके अलावा, उपकरों (Cesses) और अधिभारों (Surcharges) के बढ़ते इस्तेमाल ने इस स्थिति को और विकट बना दिया है। चूंकि उपकर से एकत्र की गई राशि को विभाज्य पूल (Divisible Pool) का हिस्सा नहीं माना जाता, इसलिए केंद्र सरकार इसका उपयोग अपनी मर्जी से करती है और राज्यों को इसमें से उनका वाजिब हिस्सा नहीं मिलता। परिणाम यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और स्थानीय बुनियादी ढांचे जैसे सीधे जनता से जुड़े क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालने वाले राज्य वित्तीय तंगी से जूझ रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार केंद्रीय योजनाओं के जरिए ब्रांडिंग और नीतिगत नियंत्रण अपने हाथ में केंद्रित कर रही है।
गैर-शासी दल वाले राज्यों के साथ बजटीय भेदभाव के आरोप अब महज राजनीतिक बयानबाजी नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक संस्थागत परिपाटी का रूप लेते दिख रहे हैं। केंद्रीय वित्त आयोग (Finance Commission) की सिफारिशों के बावजूद संसाधनों का असमान वितरण राज्यों के बीच असंतोष को बढ़ा रहा है। जब राज्यों को अपनी बुनियादी प्राथमिकताओं के लिए भी केंद्र का मुंह देखना पड़े, तो यह केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पतन का भी संकेत है।
भारत की आर्थिक प्रगति का रास्ता नई दिल्ली से होकर नहीं, बल्कि राज्यों की राजधानियों और उनकी पंचायतों से होकर गुजरता है। यदि केंद्र सरकार "सहकारी संघवाद" (Cooperative Federalism) के नारे को केवल विज्ञापनों तक सीमित रखने के बजाय धरातल पर उतारना चाहती है, तो उसे राज्यों की वित्तीय निर्भरता को खत्म करना होगा। वित्तीय संसाधनों का निष्पक्ष आवंटन और राज्यों के अधिकारों का सम्मान ही एक अखंड, समृद्ध और लोकतांत्रिक भारत की असल गारंटी है।
