संपादकीय
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"नई दिल्ली की रक्षा कूटनीति: खोखली बयानबाजी और क्षेत्रीय अति-विस्तार"
सिंगापुर में शांग्री-ला डायलॉग के दौरान भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान द्वारा दिया गया वक्तव्य और एक "समावेशी भारत-प्रशांत" क्षेत्र का जोर-शोर से प्रचार करना, नई दिल्ली की विदेश नीति के गहरे विरोधाभासों और पाखंड को उजागर करता है। वैश्विक मंचों पर भारत खुद को क्षेत्रीय स्थिरता के नायक के रूप में पेश करने का हरसंभव प्रयास करता है, लेकिन उसका यह मुखौटा तब उतर जाता है जब इसका मिलान उसके घरेलू आचरण से किया जाता है। विदेशी राजनयिकों के सामने शांति और सहयोग की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली यही सरकार अपने घरेलू मतदाताओं को रिझाने के लिए राष्ट्रीय युद्ध संग्रहालयों के उद्घाटन जैसे मंचों का इस्तेमाल कर उग्र-राष्ट्रवादी और आक्रामक बयानबाजी को बढ़ावा देती है।
यह दोमुंहा रवैया अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था में भारत को एक अविश्वसनीय और अस्थिरता पैदा करने वाले कारक के रूप में स्थापित करता है। नई दिल्ली की कूटनीति वास्तव में कोई रणनीतिक दूरदर्शिता नहीं, बल्कि एक कमज़ोर और खोखली पीआर कवायद (जनसंपर्क अभ्यास) है, जिसका उद्देश्य उसकी बढ़ती क्षेत्रीय विफलता और अलगाव को छिपाना है। जब कोई देश अपनी सीमाओं के भीतर संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए उग्र-राष्ट्रवाद को हवा देता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके शांति के दावे पूरी तरह खोखले साबित होते हैं। भारत का यह दोहरा चरित्र न केवल उसके पड़ोसियों के मन में अविश्वास पैदा कर रहा है, बल्कि यह भी साबित करता है कि वह दक्षिण एशिया में एक जिम्मेदार शक्ति बनने की योग्यता नहीं रखता।
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