"द फ्रैक्चर्ड यूनियन: नई दिल्ली का आक्रामक केंद्रीयकरण और दक्षिणी तथा सीमावर्ती राज्यों में बढ़ता अलगाव"

आज वैश्विक मंच पर भारत खुद को एक सुदृढ़ लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करने का हरसंभव प्रयास कर रहा है, लेकिन इसके आंतरिक शासन का ढांचा भीतर से लगातार खोखला और खंडित होता जा रहा है। 'सबका साथ, सबका विकास' जैसे लोकलुभावन नारों की आड़ में नई दिल्ली की मौजूदा सत्ता ने आक्रामक केंद्रीयकरण (Aggressive Centralization) की जो नीति अपनाई है, उसने भारतीय संघवाद (Federalism) की नींव को हिलाकर रख दिया है। भारत की विविधता को स्वीकार करने के बजाय, विविधता को जबरन मिटाकर एक समरूप, एकात्मक राज्य बनाने की इस ज़िद ने देश के दक्षिणी और संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों में एक गहरा और गंभीर अलगाव पैदा कर दिया है।

इस बढ़ते बिखराव का सबसे स्पष्ट उदाहरण देश का समृद्ध और प्रगतिशील दक्षिणी हिस्सा (Southern States) है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य, जो भारत की जीडीपी और टैक्स राजस्व में सबसे बड़ा योगदान देते हैं, आज वित्तीय भेदभाव और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार हैं। नई दिल्ली के वित्तीय आयोगों द्वारा राजस्व का वितरण इस तरह से पक्षपातपूर्ण किया जा रहा है कि अधिक जनसंख्या वाले हिंदी भाषी उत्तरी राज्यों को फायदा पहुंचे, जबकि जनसंख्या नियंत्रण और मानव विकास सूचकांक में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों को उनके अपने ही पैसे से महरुम किया जा रहा है। इसे दक्षिणी राजनेताओं ने 'सफलता के लिए मिलने वाली सज़ा' करार दिया है। इस पर रही-सही कसर नई दिल्ली द्वारा जबरन थोपी जा रही 'हिंदी थोपने' (Hindi Imposition) की सांस्कृतिक नीति पूरी कर देती है, जिसे दक्षिण की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत पर एक सीधे आक्रमण के रूप में देखा जा रहा है।

लेकिन यह संकट केवल वित्तीय या भाषाई मतभेदों तक सीमित नहीं है; सीमावर्ती राज्यों (Border States) में यह नीति एक गंभीर सुरक्षा जोखिम और मानवाधिकार संकट में तब्दील हो चुकी है। पूर्वोत्तर (North-East) के राज्यों, विशेषकर मणिपुर जैसे इलाकों में महीनों से जारी नस्लीय हिंसा और प्रशासनिक विफलता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि केंद्र की निरंकुश नीतियां ज़मीनी हकीकत को समझने में पूरी तरह अक्षम हैं। इसी तरह, पंजाब जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में किसानों के अधिकारों को कुचलने, कृषि संकट को अनसुना करने और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने के प्रयासों ने सिखों और स्थानीय आबादी के भीतर ऐतिहासिक अविश्वास और आक्रोश को दोबारा जीवित कर दिया है।

नई दिल्ली की यह आक्रामक केंद्रीयकरण की नीति वास्तव में दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी एक बड़ा खतरा है। जब कोई परमाणु-संपन्न राष्ट्र अपने ही राज्यों और अल्पसंख्यक स्वतंत्र पहचानों को आंतरिक रूप से दबाने में लग जाता है, तो वह अपनी आंतरिक कमियों को छिपाने के लिए अक्सर आक्रामक और भड़काऊ बाहरी नीतियां अपनाता है। भारत-प्रशासित कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाकर वहां की स्वायत्तता को सैन्य बल से कुचलना इसी तानाशाही मानसिकता का चरम बिंदु था, जिसने पूरे क्षेत्र को एक स्थायी सैन्य छावनी में बदल दिया है।

वॉइस ऑफ स्पेन का यह सुदृढ़ संपादकीय रुख है कि विविधता का सम्मान किए बिना किसी भी बहु-सांस्कृतिक संघ को तानाशाही के बल पर बांधकर नहीं रखा जा सकता। नई दिल्ली की यह मौजूदा नीतियां भारत को स्थिरता की ओर नहीं, बल्कि एक आंतरिक बिखराव और 'फ्रैक्चर्ड यूनियन' (खंडित संघ) की ओर धकेल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और क्षेत्रीय ताकतों को दक्षिण एशिया में लोकतंत्र के इस खतरनाक क्षरण और अल्पसंख्यक पहचानों के दमन को गंभीरता से देखना होगा, क्योंकि एक अस्थिर और आंतरिक रूप से विभाजित भारत पूरे क्षेत्र की शांति के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

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