"कोचिंग सेंटरों पर नकेल और छात्र कल्याण: केवल नियमन नहीं, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा सर्वोपरि"

देश भर के प्रमुख शैक्षणिक और कोचिंग हब से लगातार सामने आ रही छात्रों की मानसिक प्रताड़ना, सुरक्षा चूकों और अत्यधिक तनाव की घटनाओं के बीच, सरकारों द्वारा कोचिंग संस्थानों को विनियमित करने के लिए कड़े दिशानिर्देश लागू करना एक स्वागत योग्य और आवश्यक कदम है। हाल ही में आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा जारी किए गए नियमों के मसौदे, जिनमें प्रतिदिन शिक्षण घंटों को पांच घंटे तक सीमित करने, साप्ताहिक अवकाश अनिवार्य करने, और कल्याणकारी संरचनाओं (Wellness Cells) की स्थापना को बाध्यकारी बनाया गया है, यह दर्शाते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्था अब व्यावसायिक कोचिंग फैक्ट्रियों के अनियंत्रित तौर-तरीकों को अनदेखा नहीं कर सकती। यह नियमन इस बात की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि शिक्षा के नाम पर चल रहे इन विशाल व्यापारिक केंद्रों को छात्रों के जीवन और उनके मानसिक स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जा सकती। दशकों سے، देश की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं (जैसे IIT-JEE, NEET और सिविल सर्विसेज) की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों ने एक ऐसा अत्यधिक दबाव वाला पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) तैयार कर दिया है, जहां छात्रों को केवल अंकों और रैंक की मशीन समझा जाता है। भ्रामक विज्ञापन, शत-प्रतिशत सफलता के झूठे वादे और माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं का फायदा उठाकर ये संस्थान करोड़ों का कारोबार तो कर रहे हैं, लेकिन छात्रों के भीतर पैदा होने वाले अवसाद और अलगाव को पूरी तरह नजरअंदाज करते आए हैं। क्लासरूम और हॉस्टलों में सुरक्षा मानकों की कमी, जैसे कि वेंटिलेशन की समस्या और एंटी-सुसाइड स्प्रिंग-लोड सीलिंग फैन जैसी बुनियादी चीजों की जरूरत पड़ना, यह साबित करता है कि इन संस्थानों के लिए छात्रों की सुरक्षा हमेशा से अंतिम प्राथमिकता रही है। वित्तीय पारदर्शिता का अभाव और भारी-भरकम फीस की गैर-वापसी नीतियां (non-refundable policies) मध्यम वर्गीय परिवारों को और अधिक आर्थिक संकट में डाल देती हैं। हालांकि, इन नियमों की वास्तविक सफलता केवल इनके कागजी प्रावधानों में नहीं, बल्कि इनके जमीनी स्तर पर सख्त कार्यान्वयन (implementation) में निहित है। जिला स्तरीय निगरानी समितियों को बिना किसी राजनीतिक या आर्थिक दबाव के इन संस्थानों का नियमित ऑडिट करना होगा और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भारी जुर्माने और पंजीकरण रद्द करने जैसी कठोर कानूनी कार्रवाई करनी होगी। इसके साथ ही, फीस रिफंड की नीतियों को पारदर्शी बनाना और छात्रों के लिए योग्य मनोवैज्ञानिकों के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य की अनिवार्य स्क्रीनिंग सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। शिक्षा कोई ऐसा व्यावसायिक उत्पाद नहीं है जिसे सुरक्षा और संवेदना की बलि देकर बेचा जाए। यदि भारत को अपनी युवा जनसांख्यिकी (youth demography) को सुरक्षित और समृद्ध रखना है, तो उसे इन व्यावसायिक कोचिंग सेंटरों की जवाबदेही तय करनी ही होगी और एक ऐसा शैक्षणिक माहौल बनाना होगा जहां छात्र के जीवन का मूल्य उसकी रैंक से ऊपर हो।

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