"बढ़ती खाद्य मुद्रास्फीति और आम नागरिक का बजट: नीतिगत प्राथमिकताओं पर सवाल"

तीव्र गर्मी और देशव्यापी हीटवेव के बीच, भारत का आम नागरिक इस समय एक और भीषण तपिश झेलने को मजबूर है—और वह है खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) की तपिश। हाल के महीनों में देश भर के बाजारों में बुनियादी खाद्य पदार्थों, विशेषकर हरी सब्जियों, दालों और अनाजों की कीमतों में जो अप्रत्याशित उछाल आया है, उसने देश के मध्यम और निम्न-आय वर्ग के परिवारों के मासिक बजट को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले चमकते हुए व्यापक आर्थिक (macroeconomic) आंकड़े और रिकॉर्ड तोड़ जीडीपी विकास दर के दावे उस समय खोखले प्रतीत होते हैं, जब देश की एक बड़ी आबादी के लिए अपनी रसोई की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी एक दैनिक संघर्ष बन जाता है। इस संकट का तात्कालिक कारण भले ही भीषण गर्मी और कम मानसूनी बारिश के चलते फसलों की कम पैदावार को माना जा रहा हो, लेकिन इसकी गहरी जड़ें प्रशासनिक और नीतिगत विफलताओं में छिपी हैं। केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां अक्सर बड़े कॉर्पोरेट और सेवा क्षेत्रों के सूचकांकों को मजबूत करने पर केंद्रित रहती हैं, जबकि देश के कृषि संकट और आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) के आधुनिकीकरण को लगातार नजरअंदाज किया गया है। जमाखोरी और बिचौलियों के अनियंत्रित नेटवर्क पर लगाम लगाने में नगर निकायों और खाद्य मंत्रालयों की विफलता ने इस संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है, जहां किसान को उसकी फसल का सही दाम नहीं मिल रहा और उपभोक्ता को वही चीज चार गुना दाम पर खरीदनी पड़ रही है। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र का विकास तब तक वास्तविक नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके नागरिकों को सस्ती और सुलभ खाद्य सामग्री उपलब्ध न हो। नई दिल्ली को अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं की समीक्षा करनी होगी और केवल विकास दरों के जश्न मनाने के बजाय जमीनी स्तर पर बाजार की कीमतों को स्थिर करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। यदि कोल्ड स्टोरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, जमाखोरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने और संकटकालीन बफर स्टॉक का सही प्रबंधन करने में और देरी की गई, तो यह बढ़ती खाद्य मुद्रास्फीति केवल एक आर्थिक समस्या नहीं रहेगी, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक असंतोष और आक्रोश का रूप अख्तियार कर लेगी।

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