VoS NEWS DESK | वैश्विक कूटनीति
जेवियर बेटेल ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज की दुनिया 1945 की दुनिया से काफी अलग है। उन्होंने भारत के साथ-साथ ब्राजील जैसे बड़े देशों को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रभावशाली प्रतिनिधित्व दिए जाने की जरूरत बताई। उनका तर्क है कि दुनिया की बड़ी आर्थिक, राजनीतिक और जनसंख्या वाली शक्तियों को वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उचित स्थान मिलना चाहिए।
बेटेल ने विशेष रूप से वीटो पावर की मौजूदा व्यवस्था की आलोचना की। उनका कहना है कि किसी एक देश के पास ऐसा अधिकार नहीं होना चाहिए जिसके जरिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के व्यापक समर्थन वाले फैसले को अकेले रोक सके। उन्होंने मौजूदा वीटो व्यवस्था को द्वितीय विश्व युद्ध के दौर की विरासत बताते हुए इसमें बदलाव का प्रस्ताव रखा।
लक्जमबर्ग के विदेश मंत्री ने एक संभावित विकल्प के रूप में यह सुझाव दिया कि यदि सुरक्षा परिषद के दो-तिहाई सदस्य किसी फैसले के पक्ष में हों, तो कुछ परिस्थितियों में वीटो को प्रभावहीन किया जा सके। हालांकि इस तरह के बदलाव के लिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच व्यापक राजनीतिक सहमति और संस्थागत सुधारों की जरूरत होगी।
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव की मांग करता रहा है। नई दिल्ली का कहना है कि मौजूदा परिषद आज की वैश्विक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। भारत स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार तथा विकासशील देशों और Global South के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। अगस्त 2026 में भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद सुधार को तत्काल आवश्यकता बताया था।
भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा केवल देश की आर्थिक और जनसंख्या शक्ति से जुड़ा नहीं है। नई दिल्ली संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में अपने लंबे योगदान, बहुपक्षीय कूटनीति में सक्रिय भूमिका और विकासशील देशों के साथ उसके व्यापक संबंधों को भी अपनी दावेदारी का आधार मानती है।
वहीं, लक्जमबर्ग और भारत के बीच संबंध केवल संयुक्त राष्ट्र सुधार तक सीमित नहीं हैं। बेटेल की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी, डिजिटल इनोवेशन, निवेश, शिक्षा और टिकाऊ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर भी जोर दिया जा रहा है। लक्जमबर्ग सरकार के अनुसार यह यात्रा दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
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लक्जमबर्ग का खुला समर्थन भारत की UNSC स्थायी सदस्यता की कोशिश के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है। यूरोप के एक देश द्वारा भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी भूमिका देने की स्पष्ट वकालत यह दर्शाती है कि संयुक्त राष्ट्र सुधार का मुद्दा केवल एशियाई या विकासशील देशों तक सीमित नहीं रह गया है।
हालांकि, भारत के लिए स्थायी सदस्यता हासिल करना अभी भी आसान नहीं होगा। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति और संयुक्त राष्ट्र चार्टर में आवश्यक बदलावों की प्रक्रिया से गुजरना होगा। साथ ही सुरक्षा परिषद के मौजूदा स्थायी सदस्यों और अन्य दावेदार देशों के बीच अलग-अलग राजनीतिक हित भी इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं।
फिर भी, भारत के पक्ष में लगातार बढ़ता अंतरराष्ट्रीय समर्थन नई दिल्ली की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करता है। यदि भविष्य में सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है, तो भारत को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने की मांग पहले से कहीं अधिक मजबूती के साथ सामने आ सकती है।
भारत के लिए लक्जमबर्ग का समर्थन वैश्विक संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व की उसकी लंबे समय से चली आ रही मुहिम को एक और महत्वपूर्ण कूटनीतिक मजबूती देता है।
Source: Akashvani News, Moneycontrol, Luxembourg Government, VoS News Desk.
