VoS NEWS DESK | LAW & JUSTICE | 14 September 2026
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में वर्षों तक कर्मचारियों को अस्थायी या संविदा आधार पर बनाए रखना उचित नहीं है। अदालत ने विशेष रूप से उन कर्मचारियों के मामले पर चिंता जताई जो लंबे समय से अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी सेवा का लाभ नहीं मिल पाया है।
यह मामला वसई-विरार सिटी म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (VVCMC) से जुड़ा है, जहां डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों सहित बड़ी संख्या में मेडिकल कर्मचारी करीब 8 से 11 वर्षों से संविदा आधार पर काम कर रहे थे। अदालत ने इन कर्मचारियों की सेवा को नियमित करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने जनवरी 2026 में जारी उस निर्देश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत इन कर्मचारियों को दोबारा लिखित परीक्षा देने के लिए कहा गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि वर्षों तक सेवा देने वाले और आवश्यक योग्यता रखने वाले कर्मचारियों के साथ इस तरह की प्रक्रिया के जरिए फिर से अनिश्चितता पैदा करना उचित नहीं है।
न्यायमूर्ति गिरिश एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती ए. साठे की पीठ ने सरकारी संस्थानों में लंबे समय तक चलने वाली ad-hoc व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक सेवाओं में स्थायी पदों की आवश्यकता होने के बावजूद कर्मचारियों को वर्षों तक अस्थायी आधार पर रखना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने बेरोजगारी की स्थिति का भी उल्लेख करते हुए कहा कि योग्य और प्रशिक्षित लोगों का उपलब्ध होना अपने आप में एक महत्वपूर्ण संसाधन है। इसके बावजूद यदि सरकारी संस्थाएं स्थायी पदों का निर्माण करने में वर्षों लगा देती हैं और कर्मचारियों को अस्थायी नियुक्तियों में बनाए रखती हैं, तो इससे रोजगार की स्थिरता और सार्वजनिक सेवाओं दोनों पर असर पड़ सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए बार-बार अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाना चाहिए। इसके बजाय सरकार को एक व्यापक और स्पष्ट नीति तैयार करनी चाहिए, जिसके माध्यम से लंबे समय से संविदा पर काम कर रहे योग्य कर्मचारियों की स्थिति का उचित समाधान किया जा सके।
मेडिकल क्षेत्र में इस फैसले का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि डॉक्टर, नर्स और तकनीशियन सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े होते हैं। लंबे समय तक कर्मचारियों की अस्थायी स्थिति उनके नौकरी के भविष्य को प्रभावित करने के साथ-साथ संस्थानों में कर्मचारियों की निरंतरता पर भी असर डाल सकती है।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद महाराष्ट्र सरकार और संबंधित स्थानीय निकाय के सामने अब यह चुनौती होगी कि नियमितीकरण की प्रक्रिया को अदालत के आदेश के अनुरूप समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए। अदालत ने कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं।
यह फैसला महाराष्ट्र में सरकारी और स्थानीय निकायों के भीतर लंबे समय से संविदा पर काम कर रहे अन्य कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है। हालांकि प्रत्येक कर्मचारी की नियुक्ति, योग्यता और सेवा की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, इसलिए भविष्य में समान मामलों में अदालतों द्वारा तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
VoS STRATEGIC INSIGHT
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी संस्थानों में नौकरी की स्थिरता, प्रशासनिक जवाबदेही और निष्पक्ष रोजगार व्यवस्था पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। वर्षों तक संविदा पर काम करने वाले योग्य कर्मचारियों को लगातार अस्थायी स्थिति में रखना उनके भविष्य को अनिश्चित बनाता है।
फैसले का व्यापक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि महाराष्ट्र सरकार इसे कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से लागू करती है। यदि लंबे समय से कार्यरत संविदा कर्मचारियों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नीति तैयार होती है, तो यह सार्वजनिक क्षेत्र में बार-बार होने वाली अस्थायी नियुक्तियों और उससे पैदा होने वाले कानूनी विवादों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
Source: The Indian Express • Times of India
