बहुध्रुवीय विश्व में भारत की कूटनीतिक धुरी और दक्षिण एशिया की उभरती भू-राजनीति

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21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक शक्तियों का संतुलन पश्चिमी देशों से पूर्व की ओर स्थानांतरित हो रहा है। इस ऐतिहासिक बदलाव के केंद्र में भारत और दक्षिण एशियाई क्षेत्र हैं। एक तरफ जहां भारत अपनी आर्थिक और तकनीकी प्रगति के बल पर 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की मुखर आवाज बनकर उभरा है, वहीं दूसरी तरफ उसके निकटतम पड़ोस में बदलती राजनीतिक और रणनीतिक परिस्थितियां नई चुनौतियां पेश कर रही हैं।

'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व और सामरिक स्वायत्तता

भारत की मौजूदा विदेश नीति का मुख्य आधार 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) है। रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव, भारत ने किसी भी पश्चिमी या गुटबाजी वाले रुख को अपनाने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है।

  • बहुपक्षीय मंचों पर प्रभाव: G20 की सफल अध्यक्षता, ब्रिक्स (BRICS) का विस्तार और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से भारत ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत की है।

  • ग्लोबल साउथ की आवाज: जलवायु वित्त (Climate Finance), खाद्य सुरक्षा, और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI) के हस्तांतरण जैसे मुद्दों पर भारत ने विकासशील देशों के हितों को वैश्विक एजेंडे में सबसे आगे रखा है।

  • UNSC में सुधार की मांग: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में संस्थागत सुधारों के लिए भारत का दबाव अब केवल एक कूटनीतिक मांग नहीं, बल्कि उभरते वैश्विक शक्ति संतुलन की आवश्यकता बन चुका है।

'नेबरहुड फर्स्ट' नीति और क्षेत्रीय अस्थिरता का दबाव

वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख के बावजूद, उसका अपना पड़ोस गंभीर राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) नीति को क्षेत्रीय कूटनीति के मोर्चे पर कई जटिल परीक्षाओं का सामना करना पड़ रहा है:

  • बांग्लादेश में नई राजनीतिक वास्तविकता: बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक परिवर्तनों के बाद भारत के लिए अपनी पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और व्यापारिक निरंतरता बनाए रखना एक प्राथमिकता बन गया है। ऐतिहासिक और आर्थिक संबंधों को नई राजनीतिक व्यवस्था के साथ संतुलित करना अनिवार्य है।

  • मालदीव और श्रीलंका में कूटनीतिक संतुलन: हिंद महासागर में अवस्थित मालदीव और श्रीलंका की सरकारें 'इंडिया फर्स्ट' और 'चीन-संतुलन' के बीच झूलती रही हैं। भारत द्वारा संकट के समय दी गई त्वरित आर्थिक सहायता (जैसे श्रीलंका का आर्थिक राहत पैकेज) ने यह साबित किया है कि वह इस क्षेत्र का पहला और सबसे विश्वसनीय प्रतिसादकर्ता (First Responder) है।

  • पाकिस्तान और अफगानिस्तान: पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा चुनौतियां बनी हुई हैं। तालिबान शासित अफगानिस्तान के साथ सीमित व्यावहारिक संपर्क बनाए रखते हुए, भारत को आतंकवाद विरोधी चिंताओं और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी (जैसे चाबहार बंदरगाह) के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

हिंद महासागर और चीन की चुनौती

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का सबसे निर्णायक पहलू हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन का बढ़ता रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव है। चीन की 'बेल्ट एंड रोड पहल' (BRI) के तहत बुनियादी ढांचे के निर्माण ने कई पड़ोसी देशों को भारी कर्ज के जाल में उलझाया है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

इसके जवाब में भारत ने क्वाड (QUAD) ढांचे के तहत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक 'मुफ्त, खुले और नियम-आधारित भारत-प्रशांत' (Indo-Pacific) क्षेत्र की पैरवी की है। भारत का ध्यान केवल सैन्य संतुलन पर ही नहीं, बल्कि 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) पहल के माध्यम से क्षेत्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने पर है।

भविष्य की राह: सुरक्षा और आर्थिक एकीकरण

दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे कम एकीकृत क्षेत्रों में से एक है, जहां अंतर-क्षेत्रीय व्यापार बेहद कम है। भारत अगर वैश्विक शक्ति बनने के अपने लक्ष्य को मजबूती देना चाहता है, तो उसे अपने निकटतम पड़ोस को स्थिर, समृद्ध और नेटवर्क से जुड़ा हुआ बनाना होगा।

सुरक्षा चिंताओं को दूर करते हुए बुनियादी ढांचे (ऊर्जा ग्रिड, डिजिटल भुगतान प्रणाली, और सीमा पार परिवहन) का विस्तार ही चीन के प्रभाव को संतुलित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। भारत की कूटनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह वैश्विक मंच पर अपनी बड़ी भूमिका और अपने पड़ोस में रणनीतिक स्थिरता के बीच कितनी कुशलता से सामंजस्य बिठाता है।

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