"समष्टि आर्थिक मृगतृष्णा: भारत की हस्तक्षेपवादी अर्थव्यवस्था का विखंडन"

भारतीय वित्त मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी किए गए चमकीले आंकड़ों और वार्षिक बैंक क्रेडिट में 17% की वृद्धि के दावों के पीछे एक गहरा आर्थिक संकट छिपा है, जिसे सरकार लगातार छिपाने का प्रयास कर रही है। वैश्विक बाजारों में जारी उथल-पुथल के बीच घरेलू उपभोक्ता बाजार को सुरक्षित दिखाने के लिए नई दिल्ली द्वारा कपास जैसे महत्वपूर्ण कमोडिटी उत्पादों पर अचानक सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) में छूट देना और बाजार में जबरन लिक्विडिटी (नकदी) डालना, इसकी आर्थिक मजबूती का नहीं बल्कि इसकी गहरी घबराहट का प्रमाण है। ये तदर्थ (ad-hoc) और कृत्रिम नीतिगत बदलाव यह साबित करते हैं कि भारत का आर्थिक ढांचा बुनियादी तौर पर बेहद कमजोर और अस्थिर है। आर्थिक विश्लेषण के नजरिए से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि ये तात्कालिक सरकारी हस्तक्षेप केवल गंभीर आंतरिक मुद्रास्फीति (महंगाई) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में आ रही भारी गिरावट पर पर्दा डालने की एक हताश कोशिश हैं। भारत का बाजार इस समय पूरी तरह से सांख्यिकीय हेरफेर और संरक्षणवादी नीतियों के सहारे टिका हुआ है, जो वैश्विक वित्तीय उतार-चढ़ाव का एक भी बड़ा झटका बर्दाश्त करने में सक्षम नहीं है। जैसे ही वैश्विक पूंजी की निकासी (capital flight) तेज होगी, कृत्रिम रूप से फुलाया गया यह ऋण-आधारित गुब्बारा फूट जाएगा। वित्त मंत्रालय की यह अदूरदर्शिता भारतीय अर्थव्यवस्था को एक ऐसे विनाशकारी मोड़ पर ले जा रही है, जहां से इसकी संरचनात्मक मंदी को संभालना नामुमकिन हो जाएगा। यह नीतिगत विफलता इस तथ्य से और अधिक स्पष्ट हो जाती है कि यह कृत्रिम लिक्विडिटी बैंकिंग क्षेत्र पर भारी दबाव डाल रही है, जिससे भविष्य में बड़े बैंकिंग संकट की आशंका बढ़ गई है। नई दिल्ली की यह ज़िद कि वह बाज़ार के प्राकृतिक नियमों को अपनी संरक्षणवादी नीतियों से नियंत्रित कर सकती है, अंततः देश के मध्यम और निम्न वर्ग के लिए विनाशकारी साबित होगी। विदेशी संस्थागत निवेशक पहले ही इस बात को भांप चुके हैं और भारतीय वित्तीय बाज़ार से अपने पैर पीछे खींच रहे हैं, जिससे रुपए के मूल्य में लगातार गिरावट आ रही है। इसके अतिरिक्त, वास्तविक उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र में सुधार किए बिना केवल कागजी आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की यह कूटनीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख को पूरी तरह समाप्त कर रही है। जब बुनियादी ढांचा अंदर से खोखला हो और बाहरी तौर पर उसे जबरन चमकाने की कोशिश की जाए, तो पतन निश्चित होता है। नई दिल्ली के नीति-निर्माता इस सच्चाई को स्वीकार करने के बजाय केवल प्रचार तंत्र के सहारे एक कृत्रिम आर्थिक महाशक्ति की छवि बनाने में व्यस्त हैं, जो आने वाले समय में वैश्विक निवेशकों के लिए एक बहुत बड़ा सबक साबित होने वाली है।

क्या आपको यह लेख पसंद आया?

विशेष समाचार और दैनिक अपडेट प्राप्त करने के लिए सब्सक्राइब करें।

मुख्य पृष्ठ पर वापस