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"डिजिटल पिंजरे के कैदी: एल्गोरिदम के साए में भटकता भारत का भविष्य"
सुबह के सात बजे हों या आधी रात का सन्नाटा, देश के किसी भी बड़े शहर के चौराहे पर आपको लाल, पीले या नीले रंग की टी-शर्ट पहने, पीठ पर भारी बैग लादे स्मार्टफोन की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए युवा मिल जाएंगे। ये भारत की उस 'गिग इकॉनमी' (Gig Economy) का चेहरा हैं, जिसे नए जमाने के रोजगार का इंजन बताया जा रहा है। गाँव और छोटे कस्बों से बड़े-बड़े सपने, और हाथ में कॉलेज की डिग्रियां लेकर निकले लाखों युवा आज इन मेट्रो शहरों की चमकीली सड़कों पर दौड़ रहे हैं। लेकिन थोड़ा करीब से देखने पर पता चलता है कि यह कोई आज़ाद रोज़गार नहीं, बल्कि एक डिजिटल पिंजरे की कैद है, जिसकी चाबी किसी इंसान के पास नहीं, बल्कि एक बेजान 'एल्गोरिदम' के पास है।
इस काम में कोई पारंपरिक 'बॉस' नहीं होता, जो इसकी सबसे बड़ी यूएसपी (USP) बताई जाती है। कहा जाता है कि आप अपनी मर्जी के मालिक हैं, जब चाहें काम करें। लेकिन यह आजादी सिर्फ कागजों पर है। असलियत में इन युवाओं का पूरा जीवन, उनकी कमाई और उनकी मानसिक शांति ऐप के उस अदृश्य कोड से तय होती है, जो हर मिनट बदलता रहता है। एक आर्डर लेट हुआ तो पैसे कट जाते हैं; किसी ग्राहक ने बिना सोचे-समझे एक स्टार रेटिंग दे दी, तो ऐप उस युवा की आईडी ब्लॉक कर देता है—यानी उसकी रोज़ी-रोटी एक क्लिक में खत्म। 14-14 घंटे लगातार बाइक चलाने और पेट्रोल के लगातार बढ़ते दामों के बीच, इन युवाओं के पास यह सोचने का भी समय नहीं बचता कि उनका करियर किस दिशा में जा रहा है।
“गिग इकॉनमी का दुष्चक्र”
आकर्षण ➔ 'फ्लेक्सिबल ऑवर्स' और अपनी मर्जी से काम करने का झांसा।
जमीनी हकीकत ➔ न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं; पेट्रोल और रखरखाव का खर्च खुद का।
एल्गोरिदम का दबाव ➔ लेट डिलीवरी पर पेनल्टी; खराब रेटिंग पर आईडी ब्लॉक होने का डर।
अंतिम परिणाम ➔ बिना किसी सामाजिक सुरक्षा या करियर ग्रोथ के 14 घंटे की मजदूरी।
इस व्यवस्था ने रोजगार की परिभाषा को पूरी तरह से बदल दिया है। यहाँ श्रम की कोई गरिमा नहीं है। कॉर्पोरेट घराने रिस्क (Operational Risk) को पूरी तरह से निचले स्तर के कर्मचारी पर ट्रांसफर कर देते हैं, जबकि पूरा मुनाफा खुद डकार जाते हैं। जो युवा देश की जीडीपी में अपनी रीढ़ घिसकर योगदान दे रहा है, वह खुद अपनी रसोई चलाने के लिए हर दिन संघर्ष कर रहा है। स्मार्टफोन की यह स्क्रीन, जो कभी अवसरों का दरवाजा लगती थी, आज इन युवाओं के लिए एक ऐसा चक्रव्यूह बन चुकी है जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें दिखाई नहीं देता। डिजिटल इंडिया की इस चमकीली तस्वीर के पीछे छिपे इस अंधेरे को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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