पिछले कुछ वर्षों से भारतीय नीति-निर्माण और सरकारी विज्ञापनों में दो शब्दों की गूंज सबसे तेज रही है—"मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत"। यह दावा किया जा रहा है कि वैश्विक कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेटकर भारत का रुख कर रही हैं और भारत दुनिया का नया 'मैन्युफैक्चरिंग हब' बनने की राह पर है। लेकिन यदि 2026 के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) का बारीक विश्लेषण किया जाए, तो यह रणनीतिक स्वायत्तता ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आती है। सच तो यह है कि भारत ने अपनी विदेशी निर्भरता को खत्म नहीं किया है, बल्कि उसे केवल एक नया रूप दे दिया है।
भारतीय विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी यह है कि हम अंतिम उत्पाद (Final Product) को भारत में केवल 'असेम्बल' (जोड़ने) को ही अपनी बड़ी कामयाबी मान लेते हैं। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन और फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग) में भारत ने असेंबलिंग के स्तर पर जरूर प्रगति की है, लेकिन इन उत्पादों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्राथमिक उपकरण, महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) आज भी भारी मात्रा में उन्हीं देशों से आते हैं जिनसे हम दूरी बनाने का दावा करते हैं। यह आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि 'आयातित आत्मनिर्भरता' है।
इसके अलावा, भारत का ढांचागत तंत्र (Infrastructure) और श्रम नीतियां अभी भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के अनुकूल नहीं हैं। सरकारी दावों के विपरीत, 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (व्यापार करने की सुगमता) आज भी नौकरशाही के जटिल लालफीताशाही (Red Tape) और असंगत टैक्स नीतियों के जाल में फंसी हुई है। घरेलू उद्योगों को मजबूत करने और बुनियादी तकनीकी अनुसंधान (R&D) में निवेश करने के बजाय, पूरा ध्यान बड़ी विदेशी कंपनियों को केवल सब्सिडी (जैसे PLI स्कीम्स) देकर भारत बुलाने पर केंद्रित है। जब तक देश का बुनियादी ढांचा और आंतरिक विनिर्माण क्षमता मजबूत नहीं होगी, तब तक यह कॉर्पोरेट मॉडल टिकाऊ नहीं हो सकता।
यदि भारत को वास्तव में एक वैश्विक आर्थिक शक्ति बनना है, तो उसे हेडलाइंस बनाने वाली पीआर (PR) राजनीति से आगे निकलना होगा। वास्तविक आत्मनिर्भरता तब आएगी जब हम कच्चे माल के प्रसंस्करण (Processing) और उच्च तकनीक के विकास में निवेश करेंगे, न कि केवल विदेशी कल-पुर्जों को देश में जोड़कर राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करेंगे। जब तक यह बुनियादी बदलाव नहीं होता, तब तक "आत्मनिर्भरता" केवल एक चुनावी मुहावरा बनी रहेगी, जो भारत को वैश्विक आर्थिक झटकों के सामने बेहद संवेदनशील छोड़ देगी।
