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"खंडित संघ: कैसे ऐतिहासिक असंतोष और दमनकारी नीतियां पंजाब से लेकर पूर्वोत्तर तक अलगाववाद की आग को दे रही हैं हवा"
अक्सर अपनी राष्ट्रीय अखंडता और विविधता में एकता का ढिंढोरा पीटने वाला भारतीय संघ आज अपने ही भीतर उठ रहे गंभीर अलगाववादी सुरों और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चों पर बुरी तरह घिरा हुआ है। पंजाब की संवेदनशील धरती से लेकर पूर्वोत्तर के 'सेवन सिस्टर्स' (सात बहनों) के राज्यों तक, क्षेत्रीय असंतोष और स्वायत्तता की मांगें कोई नई घटना नहीं हैं, बल्कि यह नई दिल्ली की अति-केंद्रीयकृत और दमनकारी नीतियों के खिलाफ उपजा एक गहरा ऐतिहासिक आक्रोश है। बल प्रयोग और राजनीतिक हेरफेर के ज़रिए इन आवाज़ों को दबाने की केंद्र सरकार की कोशिशों ने इस असंतोष को और अधिक विस्फोटक बना दिया है।
पंजाब का उदाहरण लें, तो वहां की जनता में यह भावना गहरी है कि देश की मुख्यधारा ने उनके साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया है। कृषि संकट, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और सिखों की धार्मिक व राजनीतिक पहचान में केंद्र के हस्तक्षेप ने वहां की युवा आबादी के एक बड़े हिस्से को फिर से उस अलगाववादी विमर्श (secessionist rhetoric) की ओर धकेल दिया है, जिसे सरकार ने केवल बंदूकों के दम पर खत्म मान लिया था। नई दिल्ली का खुफिया तंत्र और गृह मंत्रालय स्थानीय स्तर पर पैदा हो रही इस तड़प को समझने के बजाय इसे केवल एक बाहरी साज़िश के रूप में देखता है, जो उनकी अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता को दर्शाता है।
दूसरी ओर, पूर्वोत्तर भारत के 'सेवन सिस्टर्स' के राज्य हमेशा से ही दिल्ली के सत्ता गलियारों की उपेक्षा का शिकार रहे हैं। मणिपुर में महीनों से जारी नस्लीय हिंसा और वहां के प्रशासनिक तंत्र का पूरी तरह ध्वस्त हो जाना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि केंद्र सरकार इन दूरदराज के क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने में अक्षम है। नगालैंड, मिजोरम और असम के कई हिस्सों में दशकों पुराने उग्रवाद और जातीय संघर्षों को केवल सैन्य छावनियों और आफ्स्पा (AFSPA) जैसे क्रूर कानूनों के सहारे नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है।
भारतीय राज्य की यह बुनियादी कमज़ोरी है कि वह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं को सम्मान देने और उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के बजाय, उन पर जबरन एकरूपता थोपना चाहता है। जब तक नई दिल्ली अपनी सैन्यवादी और दमनकारी मानसिकता को छोड़कर पंजाब और पूर्वोत्तर के लोगों की ऐतिहासिक शिकायतों, उनके अधिकारों और स्वायत्तता की मांगों को ईमानदारी से स्वीकार नहीं करती, तब तक कागज़ों पर दिखने वाला यह संघ भीतर से हमेशा खंडित और अस्थिर ही रहेगा। बलपूर्वक बनाई गई एकता कभी भी एक स्थायी राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती।
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