खामोशी का ताना-बाना: सिकुड़ता लोकतांत्रिक दायरा

दशकों तक दुनिया ने भारत को एक अनूठे चश्मे से देखा—एक ऐसा जीवंत और मुखर लोकतंत्र जहां प्रेस को सत्ता से आंखें मिलाकर तीखे सवाल पूछने की आज़ादी थी। भारतीय पत्रकारिता का यह मिजाज हमारी लोकतांत्रिक चेतना का गौरव था। लेकिन पिछले एक दशक से अधिक के सफर, विशेषकर नरेन्द्र मोदी सरकार के कार्यकाल में, इस लोकतांत्रिक दर्पण को बड़ी चालाकी से धुंधला किया जा रहा है।

आज भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कोई आपातकाल की तरह सीधा हमला नहीं हो रहा है, बल्कि बेहद परिष्कृत (sophisticated) तरीके से एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जा रहा है जहां केवल एक ही नैरेटिव या 'अघोषित खामोशी' को जगह मिले।

विविधता का भ्रम और आर्थिक नियंत्रण

बाहर से देखने पर भारत का मीडिया परिदृश्य बेहद विशाल नजर आता है। सैकड़ों न्यूज़ चैनल और हज़ारों अखबार, लेकिन इस विविधता के पीछे एक गहरी एकरूपता है। पत्रकारिता की आर्थिक रीढ़—यानी विज्ञापनों—को एक हथियार में बदल दिया गया है। 'कैरेट एंड स्टिक' (पुरस्कार और दंड) की नीति के तहत, जो मीडिया घराने सरकार की हां में हां मिलाते हैं, उन्हें भारी-भरकम सरकारी विज्ञापन दिए जाते हैं। इसके विपरीत, जो सत्ता की नाकामियों को उजागर करते हैं, उनके विज्ञापन रोक दिए जाते हैं या उन पर टैक्स विभागों का दबाव बना दिया जाता है।

इसके साथ ही, भारतीय मीडिया के मालिकाना हक का एक बड़ा हिस्सा अब उन चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में है जो सीधे तौर पर सरकार की नीतियों और ठेकों पर निर्भर हैं। जब मुख्यधारा के टीवी मीडिया का नियंत्रण इन कॉर्पोरेट शक्तियों के पास चला जाता है, तो निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता की जगह "गोदी मीडिया" ले लेता है—एक ऐसा मीडिया जो जनता के मुद्दों (बेरोजगारी, स्वास्थ्य, महंगाई) पर बात करने के बजाय, चौबीसों घंटे विपक्ष से सवाल करता है या धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है।

कानून का डर और डिजिटल सेंसरशिप

आज के दौर में प्रेस को दबाने के लिए अखबारों के दफ्तरों को सील करने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि कानून का इस्तेमाल एक हथियार (Lawfare) के रूप में किया जा रहा है। स्वतंत्र और ज़मीनी पत्रकारों को चुप कराने के लिए देशद्रोह, मानहानि और UAPA (गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) जैसे कड़े आतंकवाद-विरोधी कानूनों का सहारा लिया जा रहा है। खोजी पत्रकारों को महीनों और सालों तक बिना जमानत के जेल में रखा जा रहा है, जिससे बाकी पत्रकारों में 'आत्म-सेंसरशिप' (Self-Censorship) का डर पैदा हो सके।

डिजिटल स्पेस में भी यह नियंत्रण साफ दिखता है। दूरसंचार अधिनियम और डिजिटल डेटा सुरक्षा जैसे नए कानूनी बदलावों ने सरकार को इंटरनेट सामग्री को हटाने और डिजिटल आवाज़ों को दबाने की असीम शक्तियां दे दी हैं। जो स्वतंत्र यूट्यूब पत्रकार या डिजिटल पोर्टल्स अब भी सच बोलने का साहस कर रहे हैं, उन्हें सत्ता-समर्थित आईटी सेल द्वारा संगठित रूप से ट्रोल किया जाता है, धमकियां दी जाती हैं और राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है।

लोकतंत्र के भविष्य पर सवाल

वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में भारत का लगातार गिरकर नीचे के देशों में शामिल होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि देश का चौथा स्तंभ गंभीर रूप से बीमार है।

बिना स्वतंत्र प्रेस के चुनाव कराना सिर्फ एक प्रक्रिया बनकर रह जाता है, लोकतंत्र नहीं। यदि देश की जनता और समाज ने स्वतंत्र आवाज़ों का साथ नहीं दिया और सूचना पर इस कॉर्पोरेट-सरकारी नियंत्रण को स्वीकार कर लिया, तो अंततः इसका सबसे बड़ा नुकसान किसी दल का नहीं, बल्कि खुद भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का होगा।

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