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"गिग इकॉनमी और सामाजिक सुरक्षा का अभाव: कॉर्पोरेट वैल्यूएशन के बीच बुनियादी श्रम अधिकारों की उपेक्षा"
भारत के शहरी परिदृश्य में त्वरित वाणिज्य (quick commerce) और डिजिटल डिलीवरी सेवाओं की बाढ़ ने जहां उपभोक्ताओं की जिंदगी को बेहद आसान बना दिया है, वहीं इस पूरी व्यवस्था को अपने कंधों पर टिकाने वाले 'गिग वर्कर्स' (Gig Workers) का जीवन एक अनिश्चित अंधकार में डूब गया है। जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और ज़ेप्टो जैसे बड़े डिजिटल मंचों के लिए काम करने वाले लाखों डिलीवरी पार्टनर्स को 'स्वतंत्र ठेकेदार' (independent contractors) का आकर्षक नाम तो दिया गया है, लेकिन हकीकत में यह श्रेणी उन्हें पारंपरिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रखने और न्यूनतम मजदूरी व सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारियों से बचने का एक कॉरपोरेट जरिया मात्र बनकर रह गई है। अरबों डॉलर के मूल्यांकन (valuations) वाले इन स्टार्टअप्स की चकाचौंध के पीछे सामाजिक सुरक्षा का यह अभाव एक बड़े श्रम संकट को जन्म दे रहा है।
दशकों से, देश की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तर्ज पर अब इस व्यावसायिक क्षेत्र ने भी एक ऐसा अत्यधिक दबाव वाला पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) तैयार कर दिया है, जहां डिलीवरी पार्टनर्स के पास न तो निश्चित कामकाजी घंटे होते हैं और न ही किसी प्रकार की आय की गारंटी। भीषण हीटवेव और खराब मौसम के बीच भी 10 मिनट में डिलीवरी करने का जानलेवा दबाव इन युवाओं को सड़क दुर्घटनाओं के अत्यधिक जोखिम में डाल देता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि किसी दुर्घटना या स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति में इन कामगारों के पास न तो कोई स्वास्थ्य बीमा होता है, और न ही पेंशन या भविष्य निधि (PF) जैसी बुनियादी वित्तीय सुरक्षा। 'गिग' वर्क के नाम पर शुरू हुआ यह मॉडल अब युवाओं के आर्थिक शोषण का केंद्र बनता जा रहा है, जहां कंपनियों द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के इंसेंटिव स्ट्रक्चर को घटा दिया जाता है और विरोध करने पर आईडी ब्लॉक करने जैसी दमनकारी नीतियां अपनाई जाती हैं।
यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि वे डिजिटल विकास के जश्न के बीच देश के श्रम बल के अधिकारों की बलि न चढ़ने दें। राजस्थान जैसे राज्यों द्वारा गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा कानून बनाने की पहल के बाद, अब केंद्र सरकार को भी सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code) को देशव्यापी स्तर पर कड़ाई से लागू करना होगा। इन डिजिटल मंचों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे अपने मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा इन कामगारों के कल्याण कोष, दुर्घटना बीमा और पेंशन योजनाओं में योगदान करें। भारत का आर्थिक भविष्य केवल तकनीकी नवाचारों से नहीं, बल्कि अपने कार्यबल को एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन प्रदान करने की क्षमता से तय होगा।
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