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"वादों की चमक और जमीनी सच: मोदी सरकार की नीतियों का एक आलोचनात्मक विश्लेषण"
पिछले एक दशक से भारत की सत्ता पर काबिज मोदी सरकार ने खुद को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक महाशक्ति के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। विज्ञापनों, भव्य आयोजनों और सोशल मीडिया के दौर में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब हम इस चमक-दमक से परे हटकर जमीनी हकीकत को देखते हैं, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। सरकार की नीतियां बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने और आंकड़ों की बाजीगरी करने में तो सफल रही हैं, लेकिन उन्होंने देश की एक बहुत बड़ी आबादी को एक गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है।
इस सरकार की सबसे बड़ी विफलता देश में बेरोजगारी की भयावह स्थिति है। 'मेक इन इंडिया' और 'स्टार्टअप इंडिया' जैसे बड़े नारों के बावजूद, विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) के क्षेत्र में रोजगार बढ़ने के बजाय घटे हैं। देश का पढ़ा-लिखा युवा आज चपरासी या डिलीवरी बॉय की नौकरियों के लिए कतारों में खड़ा है। इसके साथ ही, नोटबंदी और आनन-फानन में लागू की गई जीएसटी (GST) जैसी नीतियों ने भारत की रीढ़ यानी लघु और कुटीर उद्योगों (MSMEs) को पूरी तरह तबाह कर दिया। जो क्षेत्र देश में सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करता था, वह आज भी सरकारी नीतियों की मार से उबर नहीं पाया है। अमीर और गरीब के बीच की खाई आज इतिहास में सबसे चौड़ी हो चुकी है, जहां चंद उद्योगपतियों की संपत्ति आसमान छू रही है और आम इंसान बुनियादी चीजों के लिए संघर्ष कर रहा है।
आर्थिक मोर्चे के अलावा, सरकार की नीतियां देश के सामाजिक ताने-बाने को लगातार कमजोर कर रही हैं। शासन के 'केंद्रीकरण' (सेंट्रलाइजेशन) ने भारत के संघीय ढांचे (फेडरल स्ट्रक्चर) को भारी नुकसान पहुंचाया है। गैर-भाजपा शासित राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार, केंद्रीय एजेंसियों (ED और CBI) का राजनीतिक इस्तेमाल और विरोध की हर आवाज को दबाने की नीति ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर बट्टा लगाया है। नीतियां अब जनहित को देखकर नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ और ध्रुवीकरण को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। जब तक विकास के इस 'गुजरात मॉडल' की प्राथमिकताओं में कॉर्पोरेट मुनाफे की जगह देश का आम नागरिक, किसान और मजदूर नहीं आता, तब तक विकास की यह ऊंची इमारत केवल कागजों पर ही टिकी रहेगी, जिसकी खोखली बुनियाद को देश की जनता अब साफ देख सकती है।
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