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यूरोविज़न में इज़राइल की भागीदारी पर स्पेन के बहिष्कार ने सांस्कृतिक राजनीति को तेज किया
स्पेन ने इस वर्ष के यूरोविज़न सॉन्ग कॉन्टेस्ट का बहिष्कार कर एक सांस्कृतिक आयोजन को सीधी राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह कदम इज़राइल की भागीदारी पर लगातार जताई गई आपत्तियों के बाद सामने आया, और इससे पूरे यूरोप में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंचों को केवल कला तक सीमित रहना चाहिए या उन्हें समकालीन संघर्षों और मानवीय प्रश्नों पर भी नैतिक रुख अपनाना चाहिए। स्पेन का यह फैसला सिर्फ एक प्रतीकात्मक विरोध नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे यूरोपीय जनमत, विदेश नीति की संवेदनशीलता और सांस्कृतिक कूटनीति के बदलते स्वरूप से भी जोड़ा जा रहा है। इस विवाद ने प्रतियोगिता के दर्शकों, कलाकारों और प्रसारण साझेदारों के बीच भी मतभेद पैदा किए हैं, क्योंकि कुछ लोग इसे सिद्धांत आधारित कदम मान रहे हैं, जबकि दूसरे इसे कला के मंच का राजनीतिकरण बता रहे हैं।
इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि स्पेन लंबे समय से यूरोपीय बहुपक्षीय विमर्श में खुद को मानवाधिकार, लोकतांत्रिक मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। ऐसे में यूरोविज़न जैसे लोकप्रिय आयोजन से दूरी बनाना केवल मनोरंजन जगत की खबर नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि मैड्रिड अब सांस्कृतिक आयोजनों को व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ से अलग नहीं देख रहा। इस फैसले का असर भविष्य में दूसरे यूरोपीय देशों के व्यवहार, सार्वजनिक प्रसारकों की भूमिका और कला-संस्थानों की राजनीतिक सीमाओं पर भी पड़ सकता है। यदि यह प्रवृत्ति बढ़ती है, तो अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ आगे चलकर केवल प्रतिभा प्रदर्शन का मंच न रहकर वैश्विक नैतिक असहमति के अखाड़े में बदल सकती हैं। स्पेन के इस रुख ने यही प्रश्न तीखे रूप में सामने रखा है कि तटस्थता कब सिद्धांत बनती है और कब मौन समर्थन समझी जाती है।
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