अमेरिका की ग्रीन कार्ड पाबंदियों पर भारत की आपत्ति, JD वेंस की विदेशी कर्मचारियों संबंधी टिप्पणी से बढ़ा विवाद

अमेरिका की ग्रीन कार्ड पाबंदियों पर भारत की आपत्ति, JD वेंस की विदेशी कर्मचारियों संबंधी टिप्पणी से बढ़ा विवाद

VoS NEWS DESK | INTERNATIONAL & IMMIGRATION | 10 OCTOBER 2026

भारत और अमेरिका के बीच कुशल पेशेवरों की आवाजाही, रोजगार-आधारित आव्रजन और तकनीकी क्षेत्र में सहयोग को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। अमेरिकी प्रशासन के हालिया फैसले और उपराष्ट्रपति JD वेंस की टिप्पणियों के बाद भारत सरकार ने विदेशी कर्मचारियों के योगदान का बचाव किया है। इस घटनाक्रम का विशेष महत्व भारतीय आईटी पेशेवरों, अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों और उन कर्मचारियों के लिए है जो अमेरिका में लंबे समय तक काम करने तथा स्थायी निवास प्राप्त करने की योजना बना रहे हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय ने 9 अक्टूबर को अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारतीय प्रतिभाओं की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ मिलता है। मंत्रालय के अनुसार, भारतीय पेशेवर अमेरिकी कंपनियों को उन्नत तकनीकी कौशल उपलब्ध कराते हैं और अनुसंधान, नवाचार, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धा तथा रोजगार सृजन में योगदान देते हैं। भारत ने विदेशी कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल की गई “indentured servants” शब्दावली को अनुचित और गहराई से आपत्तिजनक बताया। इस अभिव्यक्ति का ऐतिहासिक संदर्भ ऐसे श्रमिकों से जुड़ा है जिनकी स्वतंत्रता और काम करने की शर्तें अनुबंधों के माध्यम से सीमित कर दी जाती थीं। भारत का कहना है कि इस प्रकार की भाषा आधुनिक कुशल पेशेवरों के योगदान को उचित रूप में प्रस्तुत नहीं करती।

विवाद की शुरुआत अमेरिकी प्रशासन द्वारा रोजगार-आधारित स्थायी निवास प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा के बाद हुई। यह कार्यक्रम PERM यानी Permanent Labor Certification के नाम से जाना जाता है। सामान्यतः इस प्रक्रिया में नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि किसी विदेशी कर्मचारी को स्थायी रोजगार के लिए प्रायोजित करने से संबंधित अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। यह रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के कई मामलों में एक महत्वपूर्ण चरण होता है।

अमेरिकी प्रशासन ने आरोप लगाया है कि कुछ कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े कार्यक्रमों का अनुचित इस्तेमाल कर रही हैं और इससे अमेरिकी कर्मचारियों के हित प्रभावित हो सकते हैं। उपराष्ट्रपति वेंस ने विशेष रूप से विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति और अमेरिकी कर्मचारियों की छँटनी के बीच संबंध को लेकर चिंता जताई। प्रशासन ने अपने कदम को अमेरिकी श्रमिकों की सुरक्षा और वीजा व्यवस्था में संभावित अनियमितताओं पर कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी ओर, प्रभावित कंपनियों और विदेशी पेशेवरों के संदर्भ में इस फैसले के परिणामों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

इस कार्रवाई का प्रभाव भारत के तकनीकी क्षेत्र पर विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवर सॉफ्टवेयर विकास, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, डेटा विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में काम करते हैं। अनेक भारतीय कर्मचारी रोजगार-आधारित आव्रजन प्रक्रिया के माध्यम से लंबे समय तक अमेरिका में रहने की योजना बनाते हैं। ऐसे कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में रुकावट का अर्थ भविष्य की योजनाओं, परिवार के साथ स्थायी निवास और पेशेवर अवसरों को लेकर अनिश्चितता हो सकता है।

हालाँकि, इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। PERM प्रक्रिया और H-1B वीजा कार्यक्रम एक ही व्यवस्था नहीं हैं। H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को कुछ विशेष व्यवसायों में योग्य विदेशी पेशेवरों को अस्थायी रूप से नियुक्त करने की अनुमति देता है, जबकि PERM रोजगार-आधारित स्थायी निवास प्रक्रिया का एक हिस्सा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि PERM आवेदनों का निलंबन अपने आप मौजूदा H-1B वीजा की वैधता समाप्त नहीं करता और न ही इससे वर्तमान वीजाधारकों या उनके आश्रितों की स्थिति स्वतः बदलती है। हालांकि, प्रभावित कंपनियों के पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

अमेरिकी फैसले से प्रभावित कंपनियों में भारत की प्रमुख आईटी सेवा कंपनियाँ भी शामिल हैं। TCS, इंफोसिस, विप्रो और HCL टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियाँ अमेरिकी ग्राहकों को सॉफ्टवेयर सेवाएँ, तकनीकी परामर्श, डिजिटल परिवर्तन और व्यावसायिक प्रणालियों से संबंधित सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं। इन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। यदि स्थायी निवास के लिए प्रायोजन प्रक्रिया लंबे समय तक बाधित रहती है, तो कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रतिधारण और भविष्य की योजना बनाने में अतिरिक्त कठिनाइयाँ सामने आ सकती हैं।

इस मुद्दे का प्रभाव केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के लिए भी कुशल प्रतिभाओं की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक प्रश्न है। उन्नत तकनीक, अनुसंधान और AI विकास जैसे क्षेत्रों में कंपनियाँ ऐसे कर्मचारियों पर निर्भर करती हैं जिनके पास विशेष कौशल और अनुभव होता है। भारत सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा की आवाजाही से अमेरिकी कंपनियों को भी लाभ मिलता है और इससे अनुसंधान, उत्पादकता तथा नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है।

दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन की ओर से उठाई गई चिंताओं में घरेलू कर्मचारियों के रोजगार अवसर, वेतन और विदेशी श्रम कार्यक्रमों के संभावित दुरुपयोग का मुद्दा शामिल है। इन प्रश्नों पर बहस करते समय प्रत्येक मामले के तथ्यों, कंपनियों की भर्ती प्रक्रियाओं और संबंधित श्रम नियमों को अलग-अलग देखना आवश्यक होगा। किसी पूरे क्षेत्र या सभी विदेशी कर्मचारियों के बारे में एक समान निष्कर्ष निकालने के बजाय आरोपों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर मूल्यांकन करना अधिक उचित है।

इस विवाद का एक व्यापक कूटनीतिक पहलू भी है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, रक्षा, शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी सहयोग के कई क्षेत्र हैं। दोनों देशों की कंपनियाँ और विश्वविद्यालय लंबे समय से पेशेवरों, शोधकर्ताओं तथा विद्यार्थियों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही से लाभ उठाते रहे हैं। ऐसे में आव्रजन नीतियों पर मतभेद द्विपक्षीय संबंधों में एक संवेदनशील विषय बन सकते हैं, विशेषकर तब जब भारतीय पेशेवर अमेरिकी तकनीकी उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हों।

भारतीय पेशेवरों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि नए प्रतिबंध किस प्रक्रिया पर लागू होते हैं और उनकी व्यक्तिगत आव्रजन स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। जिन कर्मचारियों के मामले प्रभावित कंपनियों के माध्यम से चल रहे हैं, उन्हें अपने नियोक्ता और योग्य आव्रजन विशेषज्ञ से अपनी स्थिति की पुष्टि करनी चाहिए। केवल PERM प्रक्रिया में निलंबन की खबर के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सभी H-1B वीजा रद्द हो गए हैं या सभी भारतीय कर्मचारियों को अमेरिका छोड़ना होगा।

आने वाले समय में इस विवाद का प्रभाव अमेरिकी आव्रजन नीति, तकनीकी कंपनियों की भर्ती रणनीतियों और भारत-अमेरिका के बीच प्रतिभा संबंधी सहयोग पर निर्भर करेगा। यदि कार्यक्रमों में बदलाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो कंपनियों को कर्मचारियों के स्थायी निवास प्रायोजन, कार्यबल नियोजन और अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियों के संबंध में अपनी रणनीतियों की समीक्षा करनी पड़ सकती है। वहीं, दोनों सरकारों के बीच संवाद से यह स्पष्ट हो सकता है कि श्रमिकों की सुरक्षा और कुशल प्रतिभाओं की आवाजाही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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अमेरिका की PERM प्रक्रिया पर लगाए गए प्रतिबंध और विदेशी कर्मचारियों पर JD वेंस की टिप्पणी भारत-अमेरिका के तकनीकी तथा आव्रजन संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा प्रस्तुत करते हैं। भारत के लिए अपने पेशेवरों के हितों की रक्षा करना और यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा की आवाजाही दोनों अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुँचा सकती है। अमेरिका के लिए घरेलू श्रमिकों की सुरक्षा तथा कंपनियों को आवश्यक कौशल उपलब्ध कराने के बीच संतुलन एक प्रमुख नीतिगत चुनौती है।

इस मामले का दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंध कितने समय तक लागू रहते हैं, प्रभावित कंपनियों के आवेदनों के साथ क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है और दोनों सरकारें अपने मतभेदों को किस तरह संबोधित करती हैं। भारतीय कर्मचारियों को PERM और H-1B के बीच अंतर समझना चाहिए तथा अपनी व्यक्तिगत आव्रजन स्थिति के बारे में आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करना चाहिए। व्यापक स्तर पर पारदर्शी नियम, श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा और द्विपक्षीय संवाद तकनीकी सहयोग को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

Source: Hindustan Times — India Condemns JD Vance’s Remark Amid Green Card Curbs | ThePrint — India Slams US Green Card Suspension

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