स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के हालिया डेटा ने वैश्विक सुरक्षा विश्लेषकों का ध्यान दक्षिण एशिया में तेजी से बदलते परमाणु परिदृश्य की ओर खींचा है। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत अपनी परमाणु क्षमताओं, विशेष रूप से अपने तैनात परमाणु हथियारों और डिलीवरी प्रणालियों (मिसाइल और पनडुब्बी नेटवर्क) का आधुनिकीकरण और विस्तार कर रहा है। इस परमाणु विस्तार को किसी एकतरफा आक्रामक कदम के रूप में देखने के बजाय, एक जटिल 'टू-फ्रंट' (दोहरे मोर्चे) सुरक्षा संकट के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसका सामना नई दिल्ली लंबे समय से कर रही है। एक तरफ पाकिस्तान की परमाणु क्षमताएं हैं और दूसरी तरफ चीन की तेजी से बढ़ती सैन्य और तकनीकी ताकत।
रणनीतिक यथार्थवाद (Strategic Realism) के सिद्धांतों के अनुसार, भारत का परमाणु आधुनिकीकरण उसके 'विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध' (Credible Minimum Deterrence) और 'नो फर्स्ट यूज़' (पहले परमाणु हमला न करने) की स्थापित नीति को बनाए रखने के लिए एक रणनीतिक अनिवार्यता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियार नियंत्रण संधियां कमजोर हो रही हों, तब अपनी सुरक्षा के लिए केवल कूटनीतिक आश्वासनों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। भारत की अग्नि-5 जैसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों का सफल परीक्षण और परमाणु त्रय (Nuclear Triad) को मजबूत करना इसी प्रतिरोधक क्षमता को पुख्ता करने की कोशिश है। इस परमाणु होड़ का बढ़ना भले ही क्षेत्र में रणनीतिक अस्थिरता के जोखिम को बढ़ाता हो, लेकिन नई दिल्ली के दृष्टिकोण से, परमाणु क्षमताओं का यह आधुनिकीकरण ही एकमात्र ऐसा साधन है जो इस त्रिकोणीय भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में शक्ति संतुलन को बनाए रख सकता है।
